Last Updated: March 21, 2026
रमज़ान का पाक महीना हर मुसलमान के दिल में एक अलग रोशनी जगाता है। पूरे दिन भूख और प्यास सहकर जब मग़रिब की अज़ान कानों में गूँजती है, तो वह लम्हा बेहद मुक़द्दस हो जाता है। उस वक़्त पढ़ी जाने वाली iftar kholne ki dua सिर्फ़ एक रस्म नहीं है – यह अल्लाह के सामने पूरे दिन की इबादत का आख़िरी और सबसे प्यारा पल है। जो मुसलमान इस दुआ को पूरी समझ और तवज्जो के साथ पढ़ता है, उसके रोज़े की क़ुबूलियत की उम्मीद और भी बढ़ जाती है।
दुआ की प्रामाणिकता तालिका
| विषय | विवरण |
|---|---|
| हदीस स्रोत | सुनन अबू दाऊद (हदीस: 2357) |
| रावी | हज़रत अब्दुल्लाह इब्न उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) |
| हदीस का दर्जा | हसन (प्रामाणिक) – शेख़ अल्बानी ने तसदीक़ की |
| पढ़ने का सही वक़्त | मग़रिब की अज़ान के बाद, पहले कौर या घूँट के साथ |
| आध्यात्मिक स्तर | सभी के लिए – शुरुआती से उन्नत तक |
Iftar Kholne ki Dua – पूरी दुआ
अरबी मतन:
ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَثَبَتَ الأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ
Iftar kholne ki dua Roman English:
Dhahaba az-zama’u wabtallatil-‘uruqu wa thabatal-ajru insha’Allah
Iftar kholne ki dua in English:
“The thirst is gone, the veins are refreshed, and the reward is confirmed, if Allah wills.”
Iftar kholne ki dua in Hindi (हिंदी अर्थ):
“प्यास चली गई, नसें तर हो गईं, और नेकी का बदला (अज्र) साबित हो गया – इन्शाअल्लाह।”
एक और प्रचलित दुआ:
اللَّهُمَّ لَكَ صُمْتُ وَعَلَى رِزْقِكَ أَفْطَرْتُ Allahumma laka sumtu wa ‘ala rizqika aftartu अर्थ: “ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा और तेरे दिए रिज़्क से इफ़्तार किया।”
नोट: यह दुआ भी अबू दाऊद (हदीस: 2358) में है, लेकिन इसकी सनद में कुछ कमज़ोरी है। अधिकांश उलमा इसे भी पढ़ने की इजाज़त देते हैं।

Iftar Kholne ki Dua क्यों ज़रूरी है?
roza iftar kholne ki dua पढ़ना सुन्नत-ए-नबवी है। नबी करीम ﷺ ने ख़ुद इफ़्तार के वक़्त यह दुआ पढ़ी और सहाबा किराम को भी इसकी तालीम दी। इस दुआ के तीन हिस्से हैं जो बेहद गहरे मायने रखते हैं।
पहला हिस्सा – “ज़मा (प्यास) चली गई” – इसमें अल्लाह का शुक्र है कि उसने रोज़ेदार को पूरे दिन सब्र की ताक़त दी।
दूसरा हिस्सा – “नसें तर हो गईं” – यह जिस्मानी राहत का ज़िक्र है जो इफ़्तार के वक़्त मिलती है।
तीसरा हिस्सा – “अज्र साबित हो गया, इन्शाअल्लाह” – यह सबसे अहम हिस्सा है। रोज़ेदार अल्लाह की रहमत पर यक़ीन रखते हुए उम्मीद करता है कि उसका पूरे दिन का रोज़ा क़ुबूल हो गया।
iftar kholne ki dua hindi mein पढ़ने से पहले उसका मतलब समझना बेहद ज़रूरी है। जब दिल से समझकर पढ़ा जाए, तो दुआ की तासीर कई गुना बढ़ जाती है।
इस दुआ को हज़रत अब्दुल्लाह इब्न उमर (रज़ि.) ने रिवायत किया है। वे नबी ﷺ के सबसे मुख़लिस सहाबा में से थे जिन्होंने हर सुन्नत को बड़ी एहतियात से अपनी ज़िंदगी में उतारा। इसीलिए यह दुआ इस्लामी नज़रिये से सबसे भरोसेमंद रिवायतों में शामिल है।
Iftar Kholne ki Dua कब पढ़ें?
ramzan iftar kholne ki dua पढ़ने के बेहतरीन मौक़े ये हैं:
- मग़रिब की अज़ान होते ही – पहले खजूर या पानी हाथ में लें, फिर दुआ पढ़ें
- पहला कौर लेने से पहले – यह सबसे सही वक़्त है
- रमज़ान के हर रोज़ – यह दुआ लाज़मी है
- ग़ैर-रमज़ान के नफ़ल रोज़ों में भी – यह दुआ पढ़ना सुन्नत है
ध्यान रखें:
- इफ़्तार को जानबूझकर देर से न करें – नबी ﷺ ने जल्दी इफ़्तार करने की तरग़ीब दी है (सहीह बुख़ारी)
- अज़ान से पहले इफ़्तार करना जायज़ नहीं
Iftar Kholne ki Dua कैसे पढ़ें – सही तरीक़ा
roza iftar kholne ki dua hindi mein पढ़ने का सही तरीक़ा यह है:
नियत करें – दिल में ठान लें कि अल्लाह की रज़ा के लिए रोज़ा खोल रहे हैं
हाथ उठाएँ – दुआ में हाथ उठाना मुस्तहब है
क़िब्ला की तरफ़ मुँह करें – अगर मुमकिन हो
धीमी आवाज़ में और पूरी तवज्जो के साथ पढ़ें
दुआ का अर्थ दिल में रखें – महज़ ज़ुबान से न पढ़ें
खजूर से इफ़्तार करें – सुन्नत यही है (जामे तिर्मिज़ी)
इफ़्तार के बाद भी शुक्र अदा करें
आम ग़लतियाँ जो बिलकुल न करें:
अज़ान से पहले खाना शुरू कर देना – इससे रोज़ा टूट जाता है
दुआ को रटी-रटाई ज़ुबान से पढ़ना – दिल की हाज़िरी बेहद ज़रूरी है
इफ़्तार में बहुत ज़्यादा देर करना – नबी ﷺ ने जल्दी इफ़्तार की सुन्नत पर ज़ोर दिया
दुआ छोड़कर सीधे खाने में लग जाना – यह सुन्नत-ए-नबवी के ख़िलाफ़ है

Iftar Kholne ki Dua के फ़वाइद (फ़ायदे)
रूहानी फ़ायदे:
- रोज़े की क़ुबूलियत की उम्मीद बढ़ती है
- अल्लाह से क़ुर्बत (नज़दीकी) का सच्चा एहसास होता है
- दिल में सुकून और शुक्रगुज़ारी का जज़्बा पैदा होता है
- पूरे रमज़ान की इबादत में बरकत आती है
अमली (व्यावहारिक) फ़ायदे:
- दिन भर की भूख-प्यास के बाद ठहराव और सब्र का एहसास होता है
- ख़ानदान के साथ मिलकर दुआ पढ़ने से रिश्ते और मज़बूत होते हैं
- बच्चों को सुन्नत सिखाने का बेहतरीन मौक़ा मिलता है
- Ramadan iftar kholne ki dua की आदत से पूरे रमज़ान का नज़म और तरतीब क़ायम होती है
ज़रूरी नोट: यह दुआ रूहानी तरक़्क़ी और अल्लाह से जुड़ाव के लिए है। यह किसी बीमारी, मानसिक परेशानी या क़ानूनी मसले का इलाज नहीं। ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर या माहिर से ज़रूर रुजू करें।
वाक़िआत – जब दुआ ने दिल बदल दिए
वाक़िआ 1: एक माँ की दुआ
लखनऊ की रहने वाली फ़ातिमा बी पिछले कई सालों से रमज़ान में रोज़े रखती थीं, लेकिन iftar kholne ki dua को महज़ एक रस्म समझती थीं। एक बार उनकी बेटी ने उन्हें iftar kholne ki dua in hindi का गहरा अर्थ समझाया। अगले दिन से जब उन्होंने मतलब समझकर पढ़ना शुरू किया, तो उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने कहा – “पहली बार महसूस हुआ कि रोज़ा सच में अल्लाह के लिए था।”
वाक़िआ 2: एक नौजवान की तब्दीली
दिल्ली के एक युवक आसिफ़ को रमज़ान में नमाज़-रोज़ा तो याद रहता था, लेकिन roja iftar kholne ki dua की सुन्नत से वे अनजान थे। मस्जिद के इमाम से इस दुआ की फ़ज़ीलत सुनने के बाद उन्होंने पूरे रमज़ान यह दुआ पाबंदी से पढ़ी। उस रमज़ान उन्हें अपने दिल में पहले से कहीं ज़्यादा सुकून का एहसास हुआ और नमाज़ में भी ख़ुशू बढ़ा।
वाक़िआ 3: बच्चों को सुन्नत सिखाना
हैदराबाद के एक घराने में अब्बा ने हर इफ़्तार पर बच्चों को iftar kholne ki dua roman english में सिखाना शुरू किया ताकि उच्चारण सही रहे। धीरे-धीरे बच्चों ने अरबी मतन भी याद कर लिया। आज वे बच्चे ख़ुद बड़े होकर अपने दोस्तों को यह दुआ सिखाते हैं – एक सुन्नत नस्ल-दर-नस्ल आगे बढ़ रही है।
संबंधित दुआएँ जो साथ पढ़ें
iftar kholne ki dua के साथ इन दुआओं को भी पढ़ना सुन्नत है:
- रोज़े की नियत की दुआ – सहरी के वक़्त नियत करना ज़रूरी है
- मग़रिब की नमाज़ की दुआएँ – इफ़्तार के बाद फ़ौरन मग़रिब पढ़ें
- खाने के बाद की दुआ – “الحمد لله الذي أطعمنا وسقانا” – हर खाने के बाद पढ़ें
- तहज्जुद और तरावीह की दुआएँ – रमज़ान की रातों को आबाद करें
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: क्या iftar kholne ki dua पढ़ना फ़र्ज़ है?
नहीं, यह फ़र्ज़ नहीं बल्कि सुन्नत और मुस्तहब (पसंदीदा) अमल है। लेकिन नबी ﷺ का तरीक़ा यही था इसलिए इसे हर हाल में पढ़ना चाहिए।
Q2: क्या iftar kholne ki dua in english या हिंदी में पढ़ सकते हैं?
अरबी में पढ़ना अफ़ज़ल है क्योंकि नबी ﷺ ने यही पढ़ी। लेकिन अगर कोई अरबी नहीं जानता, तो अपनी भाषा में अर्थ समझकर दुआ माँग सकता है। अरबी सीखने की कोशिश ज़रूर करते रहें।
Q3: क्या iftar kholne ki dua bangla या iftar kholne ki dua in urdu में भी पढ़ सकते हैं?
हाँ, अगर कोई बांग्ला या उर्दू में अर्थ समझकर पढ़ता है तो यह जायज़ है। लेकिन अरबी मतन हमेशा साथ में रखें और उसे याद करने की कोशिश जारी रखें।
Q4: दुआ पढ़ते वक़्त उच्चारण में ग़लती हो जाए तो?
अल्लाह बेहद रहीम है। अगर ग़लती हो जाए तो दोबारा पढ़ें। नियत और कोशिश सही हो तो अल्लाह माफ़ करते हैं। ग़लती से घबराएँ नहीं – सीखते रहें।
Q5: क्या ramadan iftar kholne ki dua सिर्फ़ रमज़ान के लिए है?
नहीं, यह दुआ हर रोज़ा खोलते वक़्त पढ़ी जा सकती है – चाहे रमज़ान हो, सोमवार-जुमेरात का नफ़ल रोज़ा हो या कोई भी नफ़ल रोज़ा।
Q6: क्या औरतें माहवारी के दिनों में यह दुआ पढ़ सकती हैं?
माहवारी के दिनों में रोज़ा नहीं होता, इसलिए iftar kholne ki dua की भी ज़रूरत नहीं। हाँ, वे दूसरे ज़िक्र और दुआएँ बेरोकटोक पढ़ सकती हैं।
Q7: iftar kholne ki dua shia और सुन्नी में क्या फ़र्क़ है?
दोनों मसलकों में इफ़्तार की दुआएँ पढ़ी जाती हैं। सुनन अबू दाऊद वाली दुआ सुन्नी मसलक में सबसे मशहूर है। दोनों में बुनियादी मक़सद एक ही है – अल्लाह का शुक्र और रोज़े की क़ुबूलियत की दुआ।
Q8: क्या किसी और के लिए यह दुआ माँग सकते हैं?
हाँ, दुआ दूसरों के लिए माँगना जायज़ और सवाब का काम है। आप अपने घरवालों, दोस्तों और तमाम रोज़ेदारों के रोज़ों की क़ुबूलियत के लिए दुआ कर सकते हैं।
निष्कर्ष
Iftar kholne ki dua सिर्फ़ कुछ अरबी अलफ़ाज़ नहीं – यह पूरे दिन की इबादत की मुहर है। जब रोज़ेदार पूरी तवज्जो और समझ के साथ यह दुआ पढ़ता है, तो उसका रिश्ता अल्लाह से और गहरा होता जाता है।
याद रखें – iftar kholne ki dua hindi में भी समझें, iftar kholne ki dua in arabic में भी सीखें, और Iftar Kholne ki dua roman english में उच्चारण दुरुस्त करें। जितना ज़्यादा समझकर पढ़ेंगे, उतना ज़्यादा असर दिल पर होगा।
इस रमज़ान एक काम ज़रूर करें – अपने घर के हर बच्चे को यह दुआ सिखाएँ। जो सुन्नत आप सिखाते हैं, उसका अज्र आपको भी मिलता रहता है।
नबी ﷺ ने फ़रमाया: “रोज़ेदार के लिए इफ़्तार के वक़्त एक ऐसी दुआ होती है जो रद नहीं होती।” (इब्न माजह)
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Disclaimer: यह सामग्री रूहानी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी चिकित्सीय, मनोवैज्ञानिक या क़ानूनी मसले के लिए विशेषज्ञ से संपर्क करें। इस्लामी मसाइल मसलक के अनुसार अलग हो सकते हैं।
स्रोत सत्यापित: सुनन अबू दाऊद, सहीह बुख़ारी, जामे तिर्मिज़ी, इब्न माजह